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अध्याय अठारह / Chapter Eighteen

।18.1।
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१ ॥

शब्दार्थ
अर्जुन उवाच - अर्जुन बोले
सन्न्यासस्य - संन्यास और
महाबाहो - हे महाबाहो
तत्त्वमिच्छामि - तत्व, चाहता हूँ
वेदितुम्‌ - जानना
त्यागस्य च - त्याग के
हृषीकेश - हे हृषीकेश
पृथक्केशिनिषूदन - पृथक्‌-पृथक्‌, हे केशिनिषूदन
भावार्थ/Translation
   अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामी! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्‌-पृथक्‌ जानना चाहता हूँ |18.1|

   ਅਰਜੁਨ ਬੋਲੇ - ਹੇ ਮਹਾਬਾਹੋ ! ਹੇ ਅੰਤਰਯਾਮੀ! ਹੇ ਵਾਸੁਦੇਵ ! ਮੈਂ ਸੰਨਿਆਸ ਅਤੇ ਤਿਆਗ ਦੇ ਤੱਤ ਨੂੰ ਭਿੰਨ‌ - ਭਿੰਨ‌ ਜਾਨਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ |18.1|

   1| Arjuna said O mighty-armed Hrsikesa, O slayer of Kesi, I want to know the truth about different nature of renunciation and relinquishment. |18.1|

।18.2।
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥

शब्दार्थ
श्रीभगवानुवाच - श्री भगवान् ने कहा
काम्यानां - फल के उद्देश्य से
कर्मणा - कर्मों के
न्यासं - त्याग को
सन्न्यासं - संन्यास
कवयो - कवि जन
विदुः - समझते हैं
सर्वकर्मफलत्यागं - समस्त कर्मों के फलों के त्याग को
प्राहुस्त्यागं - त्याग कहते हैं,
विचक्षणाः - विवेकशील जन

भावार्थ/Translation
   श्री भगवान् ने कहा - कवि जन फल के उद्देश्य से किए कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं और विवेकशील जन समस्त कर्मों के फलों के त्याग को त्याग कहते हैं |18.2|

   ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਂਨ ਨੇ ਕਿਹਾ - ਕਵੀ ਲੋਕ ਫਲ ਦੇ ਉਦੇਸ਼ ਨਾਲ ਕੀਤੇ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਤਿਆਗ ਨੂੰ ਸੰਨਿਆਸ ਸੱਮਝਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਵਿਵੇਕਸ਼ੀਲ ਲੋਕ ਸਬ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਫਲਾਂ ਦੇ ਤਿਆਗ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ |18.2|

   Shri Krishna replied: The learned ones say that renunciation means forgoing an action which springs from desire; and relinquishing means the surrender of its fruit. |18.2|

।18.3।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥

शब्दार्थ
त्याज्यं - त्याज्य हैं
दोषवदित्येके - दोषयुक्त होने के कारण
कर्म - कर्म
प्राहुर्मनीषिणः - मनीषी जन कहते हैं
यज्ञदानतपःकर्म - यज्ञ, दान और तपरूप कर्म
न त्याज्यमिति - त्याज्य नहीं हैं
चापरे - अन्य जन कहते हैं

भावार्थ/Translation
   मनीषी जन कहते हैं कि कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं और अन्य जन कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं |18.3|

   ਸਿਆਣੇ ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਕਰਮ ਦੋਸ਼ ਯੁਕਤ ਹੋਣ ਦੇ ਕਾਰਨ ਛੱਡਨ ਯੋਗ ਹਨ ਅਤੇ ਹੋਰ ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਯੱਗ, ਦਾਨ ਅਤੇ ਤਪ ਰੂਪ ਕਰਮ ਛੱਡਨ ਯੋਗ ਨਹੀਂ ਹਨ |18.3|

   Some philosophers say that all action is evil and should be abandoned. Others say that acts of sacrifice, benevolence and austerity should not be given up. |18.3|

।18.4।
निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥

शब्दार्थ
निश्चयं - निर्णय
श्रृणु में - को सुनो
तत्र - उस
त्यागे - त्याग के विषय में
भरतसत्तम - अर्जुन
त्यागो - वह त्याग
हि पुरुषव्याघ्र - हे अर्जुन
त्रिविधः - तीन प्रकार का
सम्प्रकीर्तितः - कहा गया है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, उस त्याग के विषय में तुम मेरे निर्णय को सुनो। हे अर्जुन, वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है |18.4|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਉਸ ਤਿਆਗ ਦੇ ਵਿਸ਼ੇ ਵਿੱਚ ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਸੁਣ । ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਉਹ ਤਿਆਗ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦਾ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ |18.4|

   O Arjuna, Hear from Me the final truth about this abandonment, it has been declared to be of three kinds. |18.4|

।18.5।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌ ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌ ॥ ५ ॥

शब्दार्थ
यज्ञदानतपःकर्म - यज्ञ, दान और तपरूप कर्म
न त्याज्यं - त्याग नहीं करना चाहिये
कार्यमेव -
तत्‌ - वह
यज्ञो दानं - यज्ञ, दान
तपश्चैव - और तप
पावनानि - पवित्र करने वाले हैं
मनीषिणाम्‌ - साधकों को

भावार्थ/Translation
   यज्ञ, दान और तपरूप कर्म का त्याग नहीं करना चाहिये, वह तो कर्तव्य है, यज्ञ, दान और तप ये साधकों को पवित्र करने वाले हैं |18.5|

   ਯੱਗ, ਦਾਨ ਅਤੇ ਤਪ ਰੂਪ ਕਰਮ ਦਾ ਤਿਆਗ ਨਹੀਂ ਕਰਣਾ ਚਾਹੀਦਾ, ਉਹ ਤਾਂ ਕਰਤੱਵ ਹੈ, ਯੱਗ, ਦਾਨ ਅਤੇ ਤਪ ਇਹ ਸਾਧਕਾਂ ਨੂੰ ਪਵਿਤਰ ਕਰਣ ਵਾਲੇ ਹਨ |18.5|

   Acts of sacrifice, gift and austerity should not be abandoned, but should be performed as a duty; sacrifice, gift and austerity purifies the wise. |18.5|

।18.6।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌ ॥ ६ ॥

शब्दार्थ
एतान्यपि तु - इन, भी
कर्माणि - कर्मों को
सङ्‍गं - आसक्ति
त्यक्त्वा - त्यागकर
फलानि च - फल और
कर्तव्यानीति - करना चाहिए
में पार्थ - हे अर्जुन
निश्चितं - निश्चित
मतमुत्तमम्‌ - मेरा उत्तम मत है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, इन कर्मों को भी, फल और आसक्ति को त्यागकर, कर्तव्य समझकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चित तथा उत्तम मत है |18.6|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਇਨਾਂ ਕਰਮਾਂ ਨੂੰ ਵੀ, ਫਲ ਅਤੇ ਆਸਕਤੀ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ, ਕਰਤੱਵ ਸੱਮਝ ਕੇ ਕਰਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਇਹ ਮੇਰਾ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਅਤੇ ਉੱਤਮ ਮਤ ਹੈ |18.6|

   O Arjuna, these actions have to be undertaken as a duty by renouncing attachment and results. This is My firm and best conclusion. |18.6|

।18.7।
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥

शब्दार्थ
नियतस्य - नियत
तु सन्न्यासः - त्याग
कर्मणो - कर्म का
नोपपद्यते - उचित नहीं है
मोहात्तस्य - मोहवश
परित्यागस्तामसः - उसका त्याग, तामस
परिकीर्तितः - कहा गया है

भावार्थ/Translation
   नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है मोहवश उसका त्याग, तामस कहा गया है |18.7|

   ਨਿਅਤ ਕਰਮ ਦਾ ਤਿਆਗ ਉਚਿਤ ਨਹੀਂ ਹੈ ਮੋਹਵਸ਼ ਉਸਦਾ ਤਿਆਗ, ਤਾਮਸ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ |18.7|

   The abandoning of daily obligatory acts is not right. Giving up that through delusion is based on ignorance. |18.7|

।18.8।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌ ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌ ॥ ८ ॥

शब्दार्थ
दुःखमित्येव - दुख समझकर
यत्कर्म - जो कर्म को
कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌ - शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है
स कृत्वा - वह करके
राजसं - राजस
त्यागं - त्याग
नैव त्यागफलं - कदापि त्याग के फल को नहीं
लभेत्‌ - पाता

भावार्थ/Translation
   जो कर्म को दुख समझकर शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है, वह उस राजस त्याग को करके कदापि त्याग के फल को नहीं पाता |18.8|

   ਜੋ ਕਰਮ ਨੂੰ ਦੁੱਖ ਸੱਮਝ ਕੇ ਸਰੀਰਕ ਕਸ਼ਟ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਤਿਆਗ ਦਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਉਸ ਰਾਜਸ ਤਿਆਗ ਨੂੰ ਕਰਕੇ ਹਰਗਿਜ਼ ਤਿਆਗ ਦੇ ਫਲ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਪਾਉਂਦਾ |18.8|

   To avoid an action due to fear of physical suffering,because it is likely to be painful, is to act from passion, and the benefit of renunciation will not accrue. |18.8|

।18.9।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन ।
सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥

शब्दार्थ
कार्यमित्येव - कर्म करना कर्तव्य है
यत्कर्म - जो कर्म
नियतं -नियत
क्रियतेअर्जुन - हे अर्जुन, किया जाता है
सङ्‍गं त्यक्त्वा - आसक्ति त्यागकर
फलं चैव - और फल
स त्यागः - वही त्याग
सात्त्विको मतः - सात्त्विक माना गया है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन - कर्म करना कर्तव्य है, ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर किया जाता है, वही त्याग सात्त्विक माना गया है |18.9|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ - ਕਰਮ ਕਰਣਾ ਕਰਤੱਵ ਹੈ, ਅਜਿਹਾ ਸੱਮਝ ਕੇ ਜੋ ਨਿਅਤ ਕਰਮ ਆਸਕਤੀ ਅਤੇ ਫਲ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹੀ ਤਿਆਗ ਸਾੱਤਵਿਕ ਮੰਨਿਆ ਗਿਆ ਹੈन द्वेष्ट्यकुशलं - अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं |18.9|

   O Arjuna, Whatever obligatory action is done, merely because it ought to be done, abandoning attachment and also the desire for fruits, that renunciation is regarded in the mode of goodness. |18.9|

।18.10।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥

शब्दार्थ
कर्म - कर्म में
कुशले - कुशल
नानुषज्जते - प्रीति नहीं करता
त्यागी - त्यागी
सत्त्वसमाविष्टो - सत्त्वगुण में स्थित है
मेधावी - बुद्धिमान्
छिन्नसंशयः - सन्देहरहित

भावार्थ/Translation
   जो अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में प्रीति नहीं करता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देह रहित अपने सत्त्वगुण में स्थित है |18.10|

   ਜੋ ਅਕੁਸ਼ਲ ਕਰਮ ਤੋਂ ਨਫਰਤ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ ਅਤੇ ਕੁਸ਼ਲ ਕਰਮ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰੀਤੀ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ, ਉਹ ਤਿਆਗੀ, ਬੁੱਧੀਮਾਨ, ਸੰਦੇਹ ਰਹਿਤ ਆਪਣੇ ਸੱਤਵ ਗੁਣ ਵਿੱਚ ਸਥਿਤ ਹੈ |18.10|

   Neither hateful of inauspicious work nor attached to auspicious work, The intelligent, doubtless, renouncer is situated in the mode of goodness. |18.10|

।18.11।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥

शब्दार्थ
न हि - क्योंकि नहीं है
देहभृता - देहधारी मनुष्य के द्वारा
शक्यं - सम्भव
त्यक्तुं - त्याग करना
कर्माण्यशेषतः - सम्पूर्ण कर्मों का
यस्तु - इसलिये जो
कर्मफलत्यागी - कर्मफलका त्यागी है
स त्यागीत्यभिधीयते - वही त्यागी कहा जाता है

भावार्थ/Translation
   क्योकि देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्म फल का त्यागी है, उसे त्यागी कहते है |18.11|

   ਕਯੋਂਕਿ ਦੇਹਧਾਰੀ ਮਨੁੱਖ ਦਾ ਸੰਪੂਰਣ ਕਰਮਾਂ ਦਾ ਤਿਆਗ ਕਰਣਾ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਇਸਲਈ ਜੋ ਕਰਮ ਫਲ ਦਾ ਤਿਆਗੀ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਤਿਆਗੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ |18.11|

   As it is not possible for an embodied being to abandon actions entirely; but he who relinquishes the fruits of actions is called a man of renunciation. |18.11|

।18.12।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌ ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌ ॥ १२ ॥

शब्दार्थ
अनिष्टमिष्टं - अच्छा, बुरा
मिश्रं च - और मिश्रित
त्रिविधं - तीन प्रकार का
कर्मणः - कर्मों का
फलम्‌ - फल
भवत्यत्यागिनां - होता है, कर्मफल का त्याग न करने वाले के
प्रेत्य न तु - मरने के बाद भी नहीं होता
सन्न्यासिनां - कर्मफल का त्याग कर देने वाले के
क्वचित्‌ - किन्तु

भावार्थ/Translation
   कर्मफल का त्याग न करने वाले के कर्मों का अच्छा, बुरा और मिश्रित- ऐसे तीन प्रकार का फल होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले के कर्मों का फल मरने के बाद भी भी नहीं होता |18.12|

   ਕਰਮਫਲ ਦਾ ਤਿਆਗ ਨਾਂ ਕਰਣ ਵਾਲੇ ਦੇ ਕਰਮਾਂ ਦਾ ਚੰਗਾ, ਭੈੜਾ ਅਤੇ ਮਿਲਿਆ ਜੁਲਿਆ - ਅਜਿਹਾ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦਾ ਫਲ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਕਰਮਫਲ ਦਾ ਤਿਆਗ ਕਰ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਦੇ ਕਰਮਾਂ ਦਾ ਫਲ ਮਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ |18.12|

   For one who is not renounced, the threefold fruits of action—desirable, undesirable and mixed—accrue after death. But those who are in the renounced the fruits of their work have no such results. |18.12|

।18.13।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌ ॥ १३ ॥

शब्दार्थ
पञ्चैतानि - ये पाँच
महाबाहो - हे अर्जुन
कारणानि - कारण
निबोध मे - मेरे से समझ
साङ्ख्ये - सांख्य में
कृतान्ते - कर्मों का अन्त करने वाले
प्रोक्तानि - बताये गये हैं
सिद्धये - सिद्धि के लिये
सर्वकर्मणाम्‌ - सम्पूर्ण कर्मों की

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, कर्मों का अन्त करने वाले सांख्य में सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरे से समझ |18.13|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਕਰਮਾਂ ਦਾ ਅੰਤ ਕਰਣ ਵਾਲੇ ਸਾਂਖਇ ਵਿੱਚ ਸੰਪੂਰਣ ਕਰਮਾਂ ਦੀ ਸਿੱਧੀ ਲਈ ਇਹ ਪੰਜ ਕਾਰਨ ਦੱਸੇ ਗਏ ਹਨ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਸੱਮਝ |18.13|

   O Arjuna, I will tell you, the five causes which, according to the Sankhya philosophy, must concur for the accomplishment of all actions. |18.13|

।18.14।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌ ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌ ॥ १४ ॥

शब्दार्थ
अधिष्ठानं - शरीर
तथा - और
कर्ता - कर्ता
करणं च - इन्द्रियां
पृथग्विधम्‌ - विविध
विविधाश्च - विविध और
पृथक्चेष्टा - पृथक्पृथक् चेष्टाएं
दैवं - दैव है
चैवात्र - तथा
पञ्चमम्‌ - पाँचवा कारण

भावार्थ/Translation
   शरीर, कर्ता, विविध इन्द्रियां, विविध और पृथक्पृथक् चेष्टाएं तथा पाँचवा कारण दैव है |18.14|

   ਸਰੀਰ, ਕਰਤਾ, ਵਿਵਿਧ ਇੰਦਰੀਆਂ, ਵਿਵਿਧ ਅਤੇ ਅਲਗ ਅਲਗ ਚੇਸ਼ਟਾਵਾਂ ਅਤੇ ਪੰਜਵਾਂ ਕਾਰਨ ਦੈਵ ਹੈ |18.14|

   The place of action (the body), the performer, the various senses, the many different kinds of endeavor, and presiding deity are the five factors of action. |18.14|

।18.15।
शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥ १५ ॥

शब्दार्थ
शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म - शरीर, वाणी और मन से जो कर्म
प्रारभते - करता है,
नरः - मनुष्य
न्याय्यं - उचित
वा विपरीतं - या अनुचित
वा पञ्चैते - ये पाँच
तस्य - उसके
हेतवः - कारण हैं

भावार्थ/Translation
   मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से जो कोई उचित या अनुचित कर्म करता है, उसके ये पाँच कारण ही हैं |18.15|

   ਮਨੁੱਖ ਆਪਣੇ ਸਰੀਰ, ਬਾਣੀ ਅਤੇ ਮਨ ਵਲੋਂ ਜੋ ਕੋਈ ਉਚਿਤ ਜਾਂ ਅਣੁਚਿੱਤ ਕਰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਸਦੇ ਇਹ ਪੰਜ ਕਾਰਨ ਹੀ ਹਨ |18.15|

   Whatever just or unjust action a man performs with the body, speech and mind, these five are the cuases for it. |18.15|

।18.16।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥

शब्दार्थ
तत्रैवं - परन्तु
सति - फिर भी
कर्तारमात्मानं - आत्मा को कर्ता
केवलं - केवल
तु यः - जो उस में
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न - मानता है, उसकी असंस्कृत बुद्धि है, नहीं
स पश्यति - वह, समझता
दुर्मतिः - दुर्मति

भावार्थ/Translation
   परन्तु फिर भी जो उस में केवल आत्मा को कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता क्योंकि उसकी असंस्कृत बुद्धि है |18.16|

   ਪਰ ਫਿਰ ਵੀ ਜੋ ਉਸ ਵਿੱਚ ਕੇਵਲ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਕਰਤਾ ਮੰਨਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਦੁਰਮਤੀ ਠੀਕ ਨਹੀਂ ਸੱਮਝਦਾ ਕਿਉਂਕਿ ਉਸਦੀ ਨਾਸਮਝ ਬੁੱਧੀ ਹੈ |18.16|

   Therefore one who thinks himself the only doer, is of perverted intelligence and cannot percieve the things as they are. |18.16|

।18.17।
यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥

शब्दार्थ
यस्य - जिसमें
नाहङ्‍कृतो - अहंकार का, नहीं है
भावो - भाव
बुद्धिर्यस्य - और जिसकी बुद्धि
न लिप्यते - भाव
हत्वापि - मारकर भी
स इमाँल्लोकान्न - वह इन प्राणियोंको, न
हन्ति न - न मारता है
निबध्यते - और बँधता है

भावार्थ/Translation
   जिसमें अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन प्राणियों को मारकर भी न मारता है और न बँधता है |18.17|

   ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਹੈਂਕੜ ਦਾ ਭਾਵ ਨਹੀਂ ਹੈ ਅਤੇ ਜਿਸਦੀ ਬੁੱਧੀ ਲਿਪਤ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਉਹ ਇਨਾਂ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਨੂੰ ਮਾਰਕੇ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮਰਦਾ ਅਤੇ ਨਾਂ ਹੀਂ ਬੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.17|

   He who has no false ego, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him. |18.17|

।18.18।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥

शब्दार्थ
ज्ञानं - ज्ञान
ज्ञेयं - ज्ञेय
परिज्ञाता - और ज्ञाता
त्रिविधा - तीन प्रकार की
कर्मचोदना - कर्म-प्रेरणा हैं
करणं - करण
कर्म - क्रिया
कर्तेति - तथा कर्ता
त्रिविधः - तीन प्रकार का
कर्मसङ्ग्रहः - कर्म-संग्रह है

भावार्थ/Translation
   ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता- ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं, करण, क्रिया और कर्ता- ये तीन प्रकार का कर्म-संग्रह है |18.18|

   ਗਿਆਨ, ਜਾਨਣ ਯੋਗ ਅਤੇ ਜਾਣਕਾਰ - ਇਹ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੀ ਕਰਮ - ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਹਨ, ਕਰਣ, ਕਿਰਆ ਅਤੇ ਕਰਤਾ - ਇਹ ਤਿੰਨ ਤਰਾੰ ਦਾ ਕਰਮ - ਸੰਗ੍ਰਿਹ ਹੈ |18.18|

   Knowledge, the object the knowledge and the knower-this is the threefold inducement to action, and the act, the actor and the instrument are the threefold constituents of action. |18.18|

।18.19।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि ॥ १९ ॥

शब्दार्थ
ज्ञानं - ज्ञान
कर्म - कर्म
च कर्ता - तथा कर्ता
च त्रिधैव - तीन प्रकार से
गुणभेदतः - गुणों के भेद से
प्रोच्यते - कहे जाते हैं
गुणसङ्ख्याने - गुणों का निरूपण करने वाले शास्त्र में
यथावच्छ्णु - यथार्थरूप से सुनो
तान्यपि - उनको तुम

भावार्थ/Translation
   गुणों का निरूपण करने वाले शास्त्र में गुणों के भेद से ज्ञान, कर्म तथा कर्ता तीन प्रकार से कहे जाते हैं, उनको तुम यथार्थरूप से सुनो |18.19|

   ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਨਿਰੂਪਣ ਕਰਣ ਵਾਲੇ ਸ਼ਾਸਤਰ ਵਿੱਚ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਭੇਦ ਨਾਲ ਗਿਆਨ, ਕਰਮ ਅਤੇ ਕਰਤਾ ਤਿੰਨ ਤਰਾਂ ਦੇ ਕਹੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਤੂੰ ਯਥਾਰਥਰੂਪ ਨਾਲ ਸੁਣ |18.19|

   The books which describe different qualities also describe three types of knowledge, action and actor; listen to these duly. |18.19|

।18.20।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥२० ॥

शब्दार्थ
सर्वभूतेषु - सब प्राणियों में
येनैकं - जिससे एक
भावमव्ययमीक्षते -
अविभक्तं - अविभक्त
विभक्तेषु - विभक्त रूप में
तज्ज्ञानं - उस ज्ञान को
विद्धि - जान
सात्त्विकम् - सात्त्विक

भावार्थ/Translation
   जिससे मनुष्य विभक्त रूप में सब प्राणियों में एक अविभक्त और अविनाशी स्वरूप को देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान |18.20|

   ਜਿਸਦੇ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਵੰਡੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸਭ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਅਣਵੰਡਿਆ ਅਤੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਸਵਰੂਪ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਗਿਆਨ ਨੂੰ ਤੂੰ ਸਾੱਤਵਿਕ ਜਾਨ |18.20|

   That knowledge by which one undivided spiritual nature is seen in all living entities, though they are divided into innumerable forms, you should understand to be in the mode of goodness. |18.20|

।18.21।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्‌ ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌ ॥ २१ ॥

शब्दार्थ
पृथक्त्वेन - अलग अलग
तु यज्ज्ञानं - जिस ज्ञान के द्वारा
नानाभावान्पृथग्विधान्‌ - अनेक भावों को अलग अलग रूप से जानता है
वेत्ति - जानता है
सर्वेषु - सम्पूर्ण
भूतेषु - प्राणियों में
तज्ज्ञानं - उस ज्ञान को
विद्धि - समझो
राजसम्‌ - राजस

भावार्थ/Translation
   जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सब अलग अलग प्राणियों में अनेक भावों को अलग अलग रूप से जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस समझो |18.21|

   ਜਿਸ ਗਿਆਨ ਦੇ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਸਭ ਵੱਖ ਵੱਖ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਅਨੇਕ ਭਾਵਾਂ ਨੂੰ ਵੱਖ ਵੱਖ ਰੂਪ ਨਾਲ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਗਿਆਨ ਨੂੰ ਤੂੰ ਰਾਜਸ ਸਮੱਝ |18.21|

   That knowledge by which one sees that in every different body there is a different type of living entity you should understand to be in the mode of passion. |18.21|

।18.22।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ २२ ॥

शब्दार्थ
यत्तु - और जिस
कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये - एक कार्य में ही, मानो वह ही पूर्ण हो
सक्तमहैतुकम्‌ - आसक्त हो जाता है, हेतुरहित
अतत्त्वार्थवदल्पंच - तत्त्वार्थ से रहित तथा संकुचित है
तत्तामसमुदाहृतम्‌ - वह ज्ञान तामस है

भावार्थ/Translation
   और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्य में ही आसक्त हो जाता है, मानो वह ही पूर्ण हो तथा जो ज्ञान हेतुरहित, तत्त्वार्थ से रहित तथा संकुचित है, वह ज्ञान तामस है |18.22|

   ਅਤੇ ਜਿਸ ਗਿਆਨ ਦੇ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਇੱਕ ਕਾਰਜ ਵਿੱਚ ਹੀ ਆਸਕਤ ਹੋ ਜਾਵੇ, ਮੰਨ ਲਉ ਉਹ ਹੀ ਸਬ ਕੁੱਝ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਜੋ ਗਿਆਨ ਹੇਤੁ ਰਹਿਤ, ਤੱਤ ਰਹਿਤ ਅਤੇ ਛੋਟਾ ਹੋਵੇ, ਉਹ ਗਿਆਨ ਤਾਮਸ ਹੈ |18.22|

   But that which clings one work as if it were all, without logic, truth, and is insignificant, that has its origin in Darkness. |18.22|

।18.23।
नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ २३ ॥

शब्दार्थ
नियतं - नित्य
सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः - आसक्तिशुन्य होकर तथा बिना राग-द्वेष के
कृतम - किया गया हो
अफलप्रेप्सुना - फलकामना से रहित
कर्म - कर्म
यत्तत्सात्त्विकमुच्यते - वह सात्त्विक कहा जाता है

भावार्थ/Translation
   जो नित्य कर्म फल कामना से रहित पुरुष द्वारा आसक्तिशुन्य होकर तथा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है |18.23|

   ਜੋ ਨਿੱਤ ਕਰਮ ਫਲ ਕਾਮਨਾ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਪੁਰਖ ਦੁਆਰਾ ਆਸਕਤੀ ਰਹਿਤ ਹੋ ਕੇ ਅਤੇ ਬਿਨਾਂ ਰਾਗ - ਦਵੇਸ਼ ਦੇ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੋਵੇ - ਉਹ ਸਾੱਤਵਿਕ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.23|

   The daily obligatory action which is performed without attachment and without likes or dislikes by one who does not hanker for rewards, that is said to be born in the mode of goodness. |18.23|

।18.24।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌॥ २४ ॥

शब्दार्थ
यत्तु - परन्तु जो
कामेप्सुना - भोगों को चाहने वाले
कर्म - कर्म
साहङ्‍कारेण - अहंकार से
वा पुनः - अथवा
क्रियते - किया जाता है
बहुलायासं - परिश्रमपूर्वक
तद्राजसमुदाहृतम्‌ - वह राजस कहा गया है

भावार्थ/Translation
   परन्तु जो कर्म, भोगों को चाहने वाले, मनुष्यके द्वारा अहंकार से अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है |18.24|

   ਪਰ ਜੋ ਕਰਮ, ਭੋਗਾਂ ਨੂੰ ਲੋਚਣ ਵਾਲੇ, ਪੁਰਖ ਦੁਆਰਾ ਹੈਂਕੜ ਨਾਲ ਅਤੇ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਰਾਜਸ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ |18.24|

   But action performed with great effort by one seeking to gratify his desires, and enacted from a sense of false ego, is called action in the mode of passion. |18.24|

।18.25।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌ ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ २५ ॥

शब्दार्थ
अनुबन्धं - परिणाम
क्षयं - हानि
हिंसामनवेक्ष्य - हिंसा का विचार न करके
च पौरुषम्‌ - और सार्मथ्य
मोहादारभ्यते - मोहवश आरम्भ किया जाता है
कर्म - कर्म
यत्तत्तामसमुच्यते - वह तामस कहलाता है

भावार्थ/Translation
   जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सार्मथ्य का विचार न करके केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहलाता है |18.25|

   ਜੋ ਕਰਮ ਨਤੀਜਾ, ਨੁਕਸਾਨ, ਹਿੰਸਾ ਅਤੇ ਆਪਣੀ ਤਾਕਤ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਨਾਂ ਕਰਕੇ ਕੇਵਲ ਮੋਹ ਦੇ ਵਸ਼ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਤਾਮਸ ਕਹਾਂਦਾ ਹੈ |18.25|

   That action which is undertaken from delusion, without a regard for the consequences, loss, injury and one's own ability that is declared to be in the mode of darkness. |18.25|

।18.26।
मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ २६ ॥

शब्दार्थ
मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी - संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला
धृत्युत्साहसमन्वितः - धैर्य और उत्साह से युक्त
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः - कार्य के सिद्ध होने और न होने में विकारों से रहित
कर्ता - कर्ता
सात्त्विक - सात्त्विक
उच्यते - कहा जाता है

भावार्थ/Translation
   जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है |18.26|

   ਜੋ ਕਰਤਾ ਸੰਗਰਹਿਤ, ਹੈਂਕੜ ਦੇ ਵਚਨ ਨਾਂ ਬੋਲਣ ਵਾਲਾ, ਸਬਰ ਅਤੇ ਉਤਸ਼ਾਹ ਨਾਲ ਭਰਿਆ ਅਤੇ ਕਾਰਜ ਦੇ ਸਿੱਧ ਹੋਣ ਅਤੇ ਨਹੀਂ ਹੋਣ ਵਿੱਚ ਹਰਸ਼ - ਸ਼ੋਕਾਦਿ ਵਿਕਾਰਾਂ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਹੈ - ਉਹ ਸਾੱਤਵਿਕ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.26|

   The agent who is free from attachment, does not make any speech of egoism, full of contentment and enthusiasm, and does not change in success or failure-that agent is said to be of the mode of goodness. |18.26|

।18.27।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ २७ ॥

शब्दार्थ
रागी - आसक्ति से युक्त
कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो - कर्मफल की इच्छावाला, लोभी
हिंसात्मकोऽशुचिः- हिंसा के स्वभाववाला, अशुद्ध
हर्षशोकान्वितः - हर्ष शोक से युक्त है
कर्ता - कर्ता
राजसः - राजस
परिकीर्तितः - कहा गया है

भावार्थ/Translation
   जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मफल की इच्छावाला, लोभी, हिंसा के स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्ष शोक से युक्त है, वह राजस कहा गया है |18.27|

   ਜੋ ਕਰਤਾ ਆਸਕਤੀ ਯੁਕਤ, ਕਰਮਫਲ ਦੀ ਇੱਛਾਵਾਲਾ, ਲੋਭੀ, ਹਿੰਸਕ ਸੁਭਾਅ ਵਾਲਾ, ਅਸ਼ੁੱਧ ਅਤੇ ਖੁਸ਼ੀ ਸੋਗ ਨਾਲ ਭਰਿਆ ਹੈ, ਉਹ ਰਾਜਸ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ |18.27|

   The worker who is attached to work and the fruits of work, and who is greedy, violent, impure, and moved by joy and sorrow, is said to be in the mode of passion. |18.27|

।18.28।
आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥ २८ ॥

शब्दार्थ
आयुक्तः - अनुचित कार्य प्रिय
प्राकृतः - अशिक्षित
स्तब्धः - अकड़वाला
शठोनैष्कृतिकोऽलसः - जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी
विषादी - विषादी
दीर्घसूत्री - दीर्घसूत्री है
च कर्ता - और कर्ता
तामस - तामस
उच्यते - कहा जाता है

भावार्थ/Translation
   जो कर्ता अनुचित कार्य प्रिय, अशिक्षित, अकड़वाला, जिद्दी, उपकारी का अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है |18.28|

   ਜਿਸ ਨੂੰ ਅਣੁਚਿਤ ਕਾਰਜ ਚੰਗਾ ਲਗਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਕਰਤਾ ਅਣਸਿੱਖਿਅਤ, ਅਕੜਵਾਲਾ, ਜਿੱਦੀ, ਉਪਕਾਰੀ ਦਾ ਅਪਕਾਰ ਕਰਨ ਵਾਲਾ, ਆਲਸੀ, ਵਿਸ਼ਾਦੀ ਅਤੇ ਕੰਮ ਨੂੰ ਲੰਬਾ ਪਾਉਣ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਉਹ ਤਾਮਸ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.28|

   The agent who likes to do the undesirable works, naive, unbending, stubborn, wicked, lazy, morose and postponing the duties for long, is said to be in the mode of ignorance. |18.28|

।18.29।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥

शब्दार्थ
बुद्धेर्भेदं - बुद्धि के भेद
धृतेश्चैव - और धृति के
गुणतस्त्रिविधं - गुणों के अनुसार तीन प्रकार के
श्रृणु - सुन
प्रोच्यमानमशेषेण - जो मैं पूर्णरूप से कहुंगा
पृथक्त्वेन - अलग से
धनंजय - अर्जुन

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, अब तू गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के तीन प्रकार के भेद अलग से सुन, जो मैं पूर्णरूप से कहुंगा |18.29|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਹੁਣ ਤੂੰ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਬੁੱਧੀ ਅਤੇ ਧ੍ਰਿਤੀ ਦੇ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਭੇਦ ਸੁਣ, ਜੋ ਮੈਂ ਪੂਰਣ ਰੂਪ ਨਾਲ ਕਹੁੰਗਾ |18.29|

   O Arjuna, listen to the classification of the intellect and fortitude, which is threefold according to the qulaities, while I elaborate it fully in a different manner. |18.29|

।18.30।
प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥

शब्दार्थ
प्रवत्तिं - प्रवृत्तिमार्ग
च निवृत्तिं - और निवृत्ति मार्ग
च कार्याकार्ये - कर्तव्य और अकर्तव्य को
भयाभये - भय और अभय को
बन्धं - बंधन
मोक्षं - मोक्ष
च या - और
वेति - जानती है
बुद्धिः सा - वह बुद्धि
पार्थ - अर्जुन
सात्त्विकी - सात्त्विकी है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, जो प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्ति मार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है |18.30|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਜੋ ਕੀ ਕਰਨ ਯੋਗ ਹੈ ਅਤੇ ਕੀ ਛੱਡਣ ਯੋਗ ਹੈ, ਕਰਤੱਵ ਅਤੇ ਅਕਰਤੱਵ ਨੂੰ, ਡਰ ਅਤੇ ਨਿਡਰ ਨੂੰ ਅਤੇ ਬੰਧਨ ਅਤੇ ਮੁਕਤੀ ਨੂੰ ਜਾਣਦੀ ਹੈ, ਉਹ ਬੁੱਧੀ ਸਾੱਤਵਿਕੀ ਹੈ |18.30|

   O Arjuna, The intellect which knows the path of work and renunciation, what ought to be done and what ought not to be done, fear and fearlessness, bondage and liberation that intellect is pure. |18.30|

।18.31।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ ३१ ॥

शब्दार्थ
यया - जिसके द्वारा
धर्ममधर्मं - धर्म और अधर्म को
च कार्यं - कर्तव्य
चाकार्यमेव - और अकर्तव्य को
च अयथावत्प्रजानाति - ठीक तरहसे नहीं जानता
बुद्धिः - बुद्धि
सा - वह
पार्थ - हे अर्जुन
राजसी - राजसी है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्म को, कर्तव्य और अकर्तव्य को भी ठीक तरह से नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है |18.31|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਮਨੁੱਖ ਜਿਸ ਨਾਲ ਧਰਮ ਅਤੇ ਅਧਰਮ ਨੂੰ, ਕਰਤੱਵ ਅਤੇ ਅਕਰਤੱਵ ਨੂੰ ਵੀ ਠੀਕ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ, ਉਹ ਬੁੱਧੀ ਰਾਜਸੀ ਹੈ |18.31|

   O Arjuna, that understanding which cannot distinguish between religion and irreligion, between action that should be done and action that should not be done, is in the mode of passion. |18.31|

।18.32।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ ३२ ॥

शब्दार्थ
अधर्मं - अधर्म को
धर्ममिति - धर्म
या मन्यते - मानती है
तमसावृता - तमस् से आवृत
सर्वार्थान्विपरीतांश्च -
बुद्धिः - बुद्धि
सा पार्थ - अर्जुन, वह
तामसी - तामसी है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, तमस् से आवृत बुद्धि अधर्म को ही धर्म मानती है और सभी विषयों का विपरीत अर्थ करती है, वह बुद्धि तामसी है |18.32|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਜਿਹੜੀ ਬੁੱਧੀ ਅਧਰਮ ਨੂੰ ਹੀ ਧਰਮ ਮੰਨਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸਾਰੇ ਮਜ਼ਮੂਨਾਂ ਦਾ ਵਿਪਰੀਤ ਮਤਲੱਬ ਕਰਦੀ ਹੈ, ਉਹ ਬੁੱਧੀ ਤਾਮਸੀ ਹੈ |18.32|

   O Arjuna, that intellect is born of ignorance mode, which being covered by darkness, considers vice as virtue, and perceives all things contrary to what they are. |18.32|

।18.33।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥

शब्दार्थ
धृत्या - धृति के द्वारा
यया - जिस
धारयते - धारण करता है
मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः - मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को
योगेनाव्यभिचारिण्या - योग अभ्यास से अव्यभिचारिणी
धृतिः - धृति
सा - वह
पार्थ - अर्जुन
सात्त्विकी - सात्त्विकी है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, जिस योग अभ्यास से अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है |18.33|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਜਿਸ ਯੋਗ ਅਭਿਆਸ ਅਤੇ ਅਚਲ ਨਿਸ਼ਚੈ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਮਨ, ਪ੍ਰਾਣ ਅਤੇ ਇੰਦਰੀਆਂ ਦੀਆਂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਨੂੰ ਧਾਰਨ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਨਿਸ਼ਚਾ ਸਾੱਤਵਿਕ ਹੈ |18.33|

   O Arjuna, that determination which is unbreakable and steadfast by yoga practice, and controls the activities of the mind, life and senses is determination in the mode of goodness. |18.33|

।18.34।
यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ ३४ ॥

शब्दार्थ
यया तु - जिस से
धर्मकामार्थान्धत्या - धृति के द्वारा, धर्म, अर्थ और काम
धारयतेऽर्जुन-धारण करता है
प्रसङ्‍गेन - अत्यन्त आसक्तिपूर्वक
फलाकाङ्क्षी - कर्मफल का इच्छुक
धृतिः सा - वह धृति
पार्थ - अर्जुन
राजसी - राजसी है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, कर्मफल का इच्छुक पुरुष अत्यन्त आसक्तिपूर्वक जिस धृति के द्वारा धर्म, अर्थ और काम को धारण करता है, वह धृति राजसी है |18.34|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਕਰਮਫਲ ਦਾ ਇੱਛੁਕ ਪੁਰਖ ਅਤਿਅੰਤ ਆਸਕਤੀ ਨਾਲ ਜਿਸ ਨਿਸ਼ਚੈ ਨਾਲ ਧਰਮ, ਅਰਥ ਅਤੇ ਕਾਮ ਨੂੰ ਧਾਰਨ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਨਿਸ਼ਚਾ ਰਾਜਸੀ ਹੈ |18.34|

   O Arjuna, But that determination by which one holds fast to fruitive results of bounden duty, wealth and sense gratification is of the nature of passion. |18.34|

।18.35।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ ३५ ॥

शब्दार्थ
यया - जिस से
स्वप्नं - स्वप्न
भयं - भय
शोकं - शोक
विषादं - दु:ख को
मदमेव च - तथा उन्मत्तता को
न विमुञ्चति - नहीं छोड़ता
दुर्मेधा - दुष्ट बुद्धि वाला
धृतिः सा - वह धारण शक्ति
पार्थ - अर्जुन
तामसी - तामसी है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, दुष्ट बुद्धिवाला जिससे स्वप्न, भय, शोक और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता- वह धारण शक्ति तामसी है |18.35|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਦੁਸ਼ਟ ਬੁੱਧੀਵਾਲਾ ਜਿਸਦੇ ਨਾਲ ਸੁਪਨੇ, ਡਰ, ਸੋਗ, ਦੁੱਖ ਅਤੇ ਮੋਹ ਨੂੰ ਵੀ ਨਹੀਂ ਛੱਡਦਾ - ਉਹ ਧਾਰਨ ਸ਼ਕਤੀ ਤਾਮਸੀ ਹੈ |18.35|

   O Arjuna, And that firmness which cannot go beyond dreaming, fearfulness,lamentation, moroseness and illusion—such unintelligent determination, is in the mode of darkness. |18.35|

।18.36।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥ ३६ ॥

शब्दार्थ
सुखं - सुख को
त्विदानीं - अब तुम
त्रिविधं - तीन प्रकार के
श्रृणु - सुनो
मे - मुझसे
भरतर्षभ - अर्जुन
अभ्यासाद्रमते - अभ्यास से रमता है
यत्र - जिसमें
दुःखान्तं - दुखों के अन्त को
च निगच्छति - प्राप्त होता है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, अब तुम तीन प्रकार के सुख को मुझसे सुनो, जिसमें साधक अभ्यास से रमता है और दुखों के अन्त को प्राप्त होता है |18.36|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਹੁਣ ਤੂੰ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਸੁਖ ਨੂੰ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਸੁਣ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਸਾਧਕ ਅਭਿਆਸ ਨਾਲ ਰਮਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਦੁਖਾਂ ਦੇ ਅੰਤ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ |18.36|

   O Arjuna, And now hear from Me the threefold pleasure, in which one rejoices by practice and comes to the end of pain. |18.36|

।18.37।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥ ३७ ॥

शब्दार्थ
यत्तदग्रे - जो प्रारम्भ में
विषमिव - विष के समान
परिणामेऽमृतोपमम्‌ - परिणाम में अमृत के समान
तत्सुखं - वह सुख
सात्त्विकं - सात्त्विक
प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌ - आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न कहा गया है

भावार्थ/Translation
   जो सुख प्रारम्भ में विष के समान है, परिणाम में अमृत के समान है, वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न सुख सात्त्विक कहा गया है |18.37|

   ਜੋ ਸੁਖ ਸ਼ੁਰੂ ਵਿੱਚ ਜ਼ਹਿਰ ਦੇ ਸਮਾਨ ਹੈ, ਅਤੇ ਨਤੀਜਾ ਅਮ੍ਰਿਤ ਦੇ ਸਮਾਨ ਹੈ, ਉਹ ਆਤਮਬੁੱਧੀ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾਲ ਪੈਦਾ ਸੁਖ ਸਾੱਤਵਿਕ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ |18.37|

   That which is like poison in the beginning, but nectar in the end, and arises from the purity of one's intellect-that joy is spoken of as born in the mode of goodness. |18.37|

।18.38।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥ ३८ ॥

शब्दार्थ
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌ - जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह
परिणामे - परिणाम में
विषमिव - विष की तरह
तत्सुखं - वह सुख
राजसं - राजस
स्मृतम्‌ - कहा गया है

भावार्थ/Translation
   जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से आरम्भ में अमृत की तरह और परिणाम में विष की तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है |18.38|

   ਜੋ ਸੁਖ ਇੰਦਰੀਆਂ ਅਤੇ ਮਜ਼ਮੂਨਾਂ ਦੇ ਸੰਜੋਗ ਨਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਵਿੱਚ ਅਮ੍ਰਿਤ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅਤੇ ਨਤੀਜੇ ਵਿੱਚ ਜ਼ਹਿਰ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਸੁਖ ਰਾਜਸ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ |18.38|

   That happiness which is derived from contact of the senses with their objects and which appears like nectar at first but poison at the end is said to be in the mode of passion. |18.38|

।18.39।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ ३९ ॥

शब्दार्थ
यदग्रे - जो प्रारम्भ में
चानुबन्धे - और परिणाम में
च सुखं - सुख
मोहनमात्मनः - आत्मा को मोहित करने वाला है
निद्रालस्यप्रमादोत्थं - निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न
तत्तामसमुदाहृतम्‌ - वह तामस कहा गया है

भावार्थ/Translation
   जो सुख प्रारम्भ में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है |18.39|

   ਜੋ ਸੁਖ ਸ਼ੁਰੂ ਵਿੱਚ ਅਤੇ ਆਖਰ ਵਿੱਚ ਵੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਮੋਹਿਤ ਕਰਣ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਉਹ ਨਿੰਦਰ, ਆਲਸ ਅਤੇ ਪ੍ਰਮਾਦ ਨਾਲ ਪੈਦਾ ਸੁਖ ਤਾਮਸ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ |18.39|

   And that happiness which is deluding the Self from beginning to end and which arises from sleep, laziness and illusion is said to be in the mode of ignorance. |18.39|

।18.40।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥ ४० ॥

शब्दार्थ
न तदस्ति - ऐसी वस्तु नहीं है
पृथिव्यां - पृथ्वी में
वा - या
दिवि - स्वर्ग में
देवेषु - देवताओं में
वा - अथवा
पुनः- और कहीं भी
सत्त्वं -वस्तु
प्रकृतिजैर्मुक्तं - प्रकृति से उत्पन्न, रहित
यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः - जो इन तीनों गुणों से

भावार्थ/Translation
   पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवाय कहीं भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो |18.40|

   ਧਰਤੀ ਵਿੱਚ ਜਾਂ ਸਵਰਗ ਵਿੱਚ ਅਤੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਵਿੱਚ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਇਲਾਵਾ ਕਿਤੇ ਵੀ ਅਜਿਹੀ ਚੀਜ਼ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਜੋ ਕੁਦਰਤ ਦੇ ਇੰਨਾ ਤਿੰਨਾਂ ਗੁਣਾਂ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਹੋਵੇ |18.40|

   There is no such entity in the world, in the heaven, among the demi-gods, which can be free from these three gunas born of Nature. |18.40|

।18.41।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ ४१ ॥

शब्दार्थ
ब्राह्मणक्षत्रियविशां - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
शूद्राणां - शूद्रों के
च - और
परन्तप - अर्जुन
कर्माणि - कर्म
प्रविभक्तानि - विभक्त किये गये
स्वभावप्रभवैर्गुणैः - स्वभाव से उत्पन्न गुणों के के अनुसार

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म, स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त किये गये |18.41|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ - ਬਾਹਮਣ , ਕਸ਼ਤਰਿਅ , ਵੈਸ਼ ਅਤੇ ਸ਼ੂਦਰ ਦੇ ਕਰਮ , ਸੁਭਾਅ ਨਾਲ ਪੈਦਾ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਵੰਡੇ ਗਏ |18.41|

   O Arjuna! The duties of spiritual teachers, the soldiers, the traders and the servants have all been divided according to the qualities in their nature.|18.41|

।18.42।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥ ४२ ॥

शब्दार्थ
शमो - शम
दमस्तपः - दम, तप
शौचं - शौच
क्षान्तिरार्जवमेव च- सहिष्णुता, सरलता
ज्ञानं - ज्ञान
विज्ञानमास्तिक्यं - विज्ञान, आस्तिक्ता
ब्रह्मकर्म - ब्राह्मण के कर्म हैं
स्वभावजम्‌ - स्वाभाविक

भावार्थ/Translation
   शम, दम, तप, शौच, सहिष्णुता, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्ता ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं |18.42|

   ਸ਼ਮ , ਦਮ , ਤਪ , ਸ਼ੁਧੀ , ਸਹਿਨਸ਼ੀਲਤਾ , ਸਰਲਤਾ , ਗਿਆਨ , ਵਿਗਿਆਨ ਅਤੇ ਆਸਤੀਕਤਾ ਇਹ ਬਾਹਮਣ ਦੇ ਸਵੈਭਾਵਕ ਕਰਮ ਹਨ |18.42|

   Serenity, self-control, austerity, purity, tolerance, honesty, knowledge, wisdom and religiousness—these are the natural qualities by which the Brahmanas work.|18.42|

।18.43।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥ ४३ ॥

शब्दार्थ
शौर्यं - शूरवीरता
तेजो - तेज
धृतिर्दाक्ष्यं - धैर्य, दक्षता
युद्धे - युद्ध से
चाप्यपलायनम्‌ - पलायन न करना
दानमीश्वरभावश्च - दान, स्वामी भावਖਤਰੀ
क्षात्रं - क्षत्रिय के
कर्म - कर्म हैं
स्वभावजम्‌ - स्वाभाविक

भावार्थ/Translation
   शूरवीरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से पलायन न करना, दान और स्वामी भाव, ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं |18.43|

   ਸ਼ੂਰਵੀਰਤਾ , ਤੇਜ , ਸਬਰ , ਯੋਗਤਾ , ਲੜਾਈ ਤੋਂ ਪਲਾਇਨ ਨਾਂ ਕਰਣਾ , ਦਾਨ ਅਤੇ ਸਵਾਮੀ ਭਾਵ , ਇਹ ਕਸ਼ਤਰਿਅ ਦੇ ਸਵੈਭਾਵਕ ਕਰਮ ਹਨ |18.43|

   Heroism, power, determination, excelling in his skills, not retreating from battle, generosity and leadership are the natural qualities of work for the kshatriyas.|18.43|

।18.44।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥ ४४ ॥

शब्दार्थ
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं - कृषि, गौ पालन तथा व्यापार
वैश्यकर्म - वैश्य के कर्म हैं
स्वभावजम्‌ - स्वाभाविक
परिचर्यात्मकं - सेवा करना
कर्म - कर्म है
शूद्रस्यापि - शूद्र का
स्वभावजम्‌ - स्वाभाविक

भावार्थ/Translation
   कृषि, गौ पालन तथा व्यापार ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, और शूद्र का स्वाभाविक कर्म है सेवा करना |18.44|

   ਖੇਤੀਬਾੜੀ, ਗਾਂ ਪਾਲਣ ਅਤੇ ਵਪਾਰ ਇਹ ਵੈਸ਼ ਦੇ ਸਵੈਭਾਵਕ ਕਰਮ ਹਨ , ਅਤੇ ਸ਼ੂਦਰ ਦਾ ਸਵੈਭਾਵਕ ਕਰਮ ਹੈ ਸੇਵਾ ਕਰਣਾ |18.44|

   Farming, cow protection and business are the natural work for the vaishyas,and for the shudras it is service to others. |18.44|

।18.45।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ ४५ ॥

शब्दार्थ
स्वे स्वे - अपने-अपने
कर्मण्यभिरतः - कर्मों में तत्परता से लगा
संसिद्धिं - परम सिद्धि
लभते - प्राप्त होता है
नरः- मनुष्य
स्वकर्मनिरतः - अपने कर्म में लगा
सिद्धिं - सिद्धि
यथा - जैसे
विन्दति - पाता है
तच्छृणु - उस को सुन

भावार्थ/Translation
   अपने-अपने कर्मों में तत्परता से लगा मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है। अपने कर्म में लगा कैसे सिद्धि पाता है, उस को सुन |18.45|

   ਆਪਣੇ - ਆਪਣੇ ਕਰਮਾਂ ਵਿੱਚ ਤਤਪਰਤਾ ਨਾਲ ਲੱਗਾ ਮਨੁੱਖ ਪਰਮ ਸਿੱਧੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਆਪਣੇ ਕਰਮ ਵਿੱਚ ਲਗਾ ਕਿਵੇਂ ਸਿੱਧੀ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ , ਉਸ ਨੂੰ ਸੁਣ |18.45|

   Being devoted to his own duty, man attains complete success. Hear that as to how one devoted to his own duty achieves success. |18.45|

।18.46।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ ४६ ॥

शब्दार्थ
यतः - जिस से
प्रवृत्तिर्भूतानां - प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है
येन - जिससे यह
सर्वमिदं - सम्पूर्ण संसार
ततम्‌ - व्याप्त है
स्वकर्मणा - अपने कर्म के द्वारा
तमभ्यर्च्य - उस का पूजन करके
सिद्धिं - सिद्धि को
विन्दति - प्राप्त हो जाता है
मानवः - मनुष्य

भावार्थ/Translation
   जिस से प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस का अपने कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है |18.46|

   ਜਿਸ ਨਾਲ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਦੀ ਉਤਪੱਤੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਜਿਸਦੇ ਨਾਲ ਇਹ ਸੰਪੂਰਣ ਸੰਸਾਰ ਵਿਆਪਤ ਹੈ , ਉਸ ਦਾ ਆਪਣੇ ਕਰਮ ਦੇ ਨਾਲ ਪੂਜਨ ਕਰਕੇ ਮਨੁੱਖ ਸਿੱਧੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.46|

   By worshipping him, who is the source of all beings and who is all-pervading, a man can attain perfection by performing his own work. |18.46|

।18.47।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥ ४७ ॥

शब्दार्थ
श्रेयान्स्वधर्मो - अपना धर्म श्रेष्ठ है
विगुणः - गुणरहित
परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ - अच्छी तरह से अनुष्ठान किये हुए पर धर्म से
स्वभावनियतं - स्वभाव से नियत
कर्म - कर्म
कुर्वन्नाप्नोति - करता हुआ, प्राप्त नहीं होता
किल्बिषम्‌ - पाप को

भावार्थ/Translation
   अच्छी तरह से अनुष्ठान किये हुए पर धर्म से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म को करता हुआ पाप को प्राप्त नहीं होता |18.47|

   ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤੇ ਹੋਏ ਦੁੱਜੇ ਦੇ ਧਰਮ ਨਾਲੋਂ ਗੁਣਰਹਿਤ ਆਪਣਾ ਧਰਮ ਸ੍ਰੇਸ਼ਟ ਹੈ । ਸੁਭਾਅ ਤੋਂ ਨਿਅਤ ਕਰਮ ਨੂੰ ਕਰਦਾ ਹੋਇਆ ਪਾਪ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ |18.47|

   It is better to engage in one’s own occupation, even though done imperfectly, than to accept another’s occupation and perform it perfectly. Duties prescribed according to one’s nature are never affected by sinful reactions. |18.47|

।18.48।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ ४८ ॥

शब्दार्थ
सहजं - सहज
कर्म - कर्म
कौन्तेय - अर्जुन
सदोषमपि - दोषयुक्त होने पर भी
न त्यजेत्‌ - नहीं त्यागना चाहिए
सर्वारम्भा - सभी कर्म
हि दोषेण - दोष से
धूमेनाग्निरिवावृताः - धुयें से अग्नि की तरह आवृत होते है

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि सभी कर्म धुयें से अग्नि की तरह दोष से आवृत होते है |18.48|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ , ਦੋਸ਼ ਯੁਕਤ ਹੋਣ ਉੱਤੇ ਵੀ ਸਹਿਜ ਕਰਮ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਤਿਆਗਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਕਿਉਂਕਿ ਸਾਰੇ ਕਰਮ ਅੱਗ ਨਾਲ ਧੁਐਂ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੋਸ਼ ਨਾਲ ਮਿਲੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ |18.48|

   O Arjuna, One should not give up the nature-born duty, even if it appears to be defective. All acts are marred by defects, as fire is covered by smoke. |18.48|

।18.49।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥ ४९ ॥

शब्दार्थ
असक्तबुद्धिः - आसक्तिरहित बुद्धि वाला
सर्वत्र - सर्वत्र
जितात्मा - जीते हुए अंतःकरण वाला
विगतस्पृहः - स्पृहारहित
नैष्कर्म्यसिद्धिं - नैष्कर्म्य सिद्धि (जिसमें वो कर्म करता हुआ भी नहीं करता)
परमां - परम
सन्न्यासेनाधिगच्छति - कर्मों के संन्यास से प्राप्त होता है

भावार्थ/Translation
   सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धि वाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला कर्मों के संन्यास से परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है |18.49|

   ਸਭਨੀ ਥਾਂਈਂ ਆਸਕਤੀ ਰਹਿਤ ਬੁੱਧੀ ਵਾਲਾ , ਭੋਤਿਕ ਭੋਗਾਂ ਤੋਂ ਦੂਰ ਅਤੇ ਜਿੱਤੇ ਹੋਏ ਅੰਤਕਰਣ ਵਾਲਾ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਸੰਨਿਆਸ ਨਾਲ ਪਰਮ ਨੈਸ਼ਕਰਮ ਸਿੱਧਿ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ |18.49|

   One who is self-controlled and unattached and who disregards all material enjoyments, by practice of renunciation, obtains the perfect stage where one does not leaves any seeds of reaction. |18.49|

।18.50।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥ ५० ॥

शब्दार्थ
सिद्धिं - सिद्धि को
प्राप्तो - प्राप्त
यथा - किस प्रकार
ब्रह्म - ब्रह्म को
तथाप्नोति - प्राप्त होता है
निबोध - जानो
मे - मुझसे
समासेनैव - संक्षेप में
कौन्तेय - हे अर्जुन
निष्ठा -निष्ठा
ज्ञानस्य - ज्ञान की
या परा - परा

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, सिद्धि को प्राप्त पुरुष किस प्रकार ब्रह्म को तथा ज्ञान की परा निष्ठा को प्राप्त होता है, मुझसे संक्षेप में जानो |18.50|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ , ਸਿੱਧੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਪੁਰਖ ਕਿਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਬ੍ਰਹਮਾ ਨੂੰ ਅਤੇ ਗਿਆਨ ਦੀ ਪਰਾ ਨਿਸ਼ਠਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ , ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਸੰਖੇਪ ਵਿੱਚ ਜਾਣ |18.50|

   O Arjuna, How one who has achieved this perfection can attain to the supreme Brahman, the state of highest knowledge; I shall now summarize.|18.50|

।18.51।
बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥ ५१ ॥

शब्दार्थ
बुद्ध्‌या - बुद्धि से
विशुद्धया - विशुद्ध
युक्तो - युक्त
धृत्यात्मानं - धृति से आत्म
नियम्य - नियमन करने वाला
च - और
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा - शब्दादि विषयों को त्याग कर
रागद्वेषौ - रागद्वेष का
व्युदस्य च - परित्याग कर

भावार्थ/Translation
   विशुद्ध बुद्धि से युक्त, धृति से आत्म नियमन करने वाला, शब्दादि विषयों को त्याग कर और रागद्वेष का परित्याग कर |18.51|

   ਖਾਲਸ ਬੁੱਧੀ ਨਾਲ ਯੁਕਤ , ਧੀਰਜ ਨਾਲ ਆਤਮ ਨਿਅਮਨ ਕਰਣ ਵਾਲਾ , ਸ਼ਬਦ ਆਦਿ ਮਜ਼ਮੂਨਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ ਅਤੇ ਰਾਗ ਦਵੇਸ਼ ਦਾ ਤਿਯਾਗ ਕਰ ਕੇ |18.51|

   Endowed with a pure intellect, controlling the self by firmness, relinquishing sense-gratifying objects and abandoning desire and hatred.|18.51|

।18.52।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥ ५२ ॥

शब्दार्थ
विविक्तसेवी - एकान्तसेवी
लघ्वाशी - अल्प भोजन करने वाला
यतवाक्कायमानस - शरीर, वाणी और मन को संयत किया है
ध्यानयोगपरो - ध्यानयोग के अभ्यास में
नित्यं - नित्य
वैराग्यं - वैराग्य
समुपाश्रितः - आश्रित

भावार्थ/Translation
   एकान्तसेवी, अल्प भोजन करने वाला, जिसने अपने शरीर, वाणी और मन को संयत किया है, नित्य ध्यानयोग के अभ्यास में तत्पर तथा वैराग्य पर आश्रित |18.52|

   ਏਕਾਂਤ ਪਸੰਦ , ਘੱਟ ਭੋਜਨ ਕਰਣ ਵਾਲਾ , ਜਿਨ੍ਹੇ ਆਪਣੇ ਸਰੀਰ , ਬਾਣੀ ਅਤੇ ਮਨ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਕੀਤਾ ਹੈ , ਨਿੱਤ ਧਿਆਨਯੋਗ ਦੇ ਅਭਿਆਸ ਵਿੱਚ ਤਤਪਰ ਅਤੇ ਤਪੱਸਿਆ ਉੱਤੇ ਆਸ਼ਰਿਤ |18.52|

   One who resorts to solitude, eats sparingly, has speech, body and mind under control, always engaged in meditation, possessed with the spirit of renunciation. |18.52|

।18.53।
अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ५३ ॥

शब्दार्थ
अहङकारं - अहंकार
बलं - बल
दर्पं - घमंड
कामं - काम
क्रोधं - क्रोध
परिग्रहम्‌ - परिग्रह (ज्यादा से ज्यादा विषयी पदार्थो को जोङना)
विमुच्य - को त्याग कर
निर्ममः - ममत्वभाव से रहित
शान्तो - शान्त पुरुष
ब्रह्मभूयाय - ब्रह्म प्राप्ति के
कल्पते - योग्य बन जाता है

भावार्थ/Translation
   अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह को त्याग कर ममत्वभाव से रहित और शान्त पुरुष ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बन जाता है |18.53|

   ਹੈਂਕੜ , ਜੋਰ , ਘਮੰਡ , ਕੰਮ , ਕ੍ਰੋਧ ਅਤੇ ਭੋਤਿਕ ਚੀਜਾਂ ਦੇ ਸੰਗ੍ਰਿਹ ਤੋਂ ਮੁਕਤ, ਮਮਤਵਭਾਵ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਅਤੇ ਸ਼ਾਂਤ ਪੁਰਖ ਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਦੇ ਲਾਇਕ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.53|

   When one becomes free from false ego, false strength, pride, lust, anger, free from collection of material things, free from false possession, and peaceful—such a person is certainly elevated to the position of self-realization. |18.53|

।18.54।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥ ५४ ॥

शब्दार्थ
ब्रह्मभूतः - ब्रह्म अवस्था को प्राप्त
प्रसन्नात्मा - प्रसन्न मनवाला
न शोचति - न शोक करता है
न काङ्क्षति - न इच्छा करता है
समः - सम भाव वाला
सर्वेषु - सम्पूर्ण
भूतेषु - प्राणियों में
मद्भक्तिं - मेरी भक्तिको
लभते - प्राप्त होता है
पराम्‌ - परा

भावार्थ/Translation
   वह ब्रह्म अवस्था को प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न शोक करता है और न इच्छा करता है, ऐसा सम्पूर्ण प्राणियों में सम भाव वाला साधक मेरी पराभक्ति को प्राप्त होता है |18.54|

   ਉਹ ਬ੍ਰਹਮ ਦੀ ਦਸ਼ਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਖੁਸ਼ ਮਨ ਵਾਲਾ ਸਾਧਕ ਨਾਂ ਸੋਗ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾਂ ਇੱਛਾ ਕਰਦਾ ਹੈ , ਅਜਿਹਾ ਸੰਪੂਰਣ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਬਰਾਬਰ ਭਾਵ ਵਾਲਾ ਸਾਧਕ ਮੇਰੀ ਪਰਾਭਗਤੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ |18.54|

   One who realizes the Supreme Brahman and with a joyful mind, never laments or desires to have anything. He is equally disposed toward every living entity and attains pure devotional service unto Me. |18.54|

।18.55।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌॥ ५५ ॥

शब्दार्थ
भक्त्या - भक्ति से
मामभिजानाति - मुझे जानता है
यावान्यश्चास्मि - मैं कितना हूँ तथा क्या हूँ
तत्त्वतः- तत्त्वत
ततो मां - वह मुझमें
तत्त्वतो - तत्त्वत
ज्ञात्वा - जानने के बाद
विशते - प्रवेश कर जाता है
तदनन्तरम्‌- तत्काल ही

भावार्थ/Translation
   भक्ति से वह मुझे तत्त्वत जानता है कि मैं कितना हूँ तथा क्या हूँ। तत्त्वत जानने के बाद तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है |18.55|

   ਭਗਤੀ ਨਾਲ ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਤੱਤ ਤੋਂ ਜਾਣਦਾ ਹੈ ਕਿ ਮੈਂ ਕਿੰਨਾ ਹਾਂ ਅਤੇ ਕੀ ਹਾਂ । ਤੱਤ ਤੋਂ ਜਾਣਨ ਦੇ ਬਾਅਦ ਤੱਤਕਾਲ ਹੀ ਉਹ ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਪਰਵੇਸ਼ ਕਰ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.55|

   Through devotion he knows Me in reality, as to what and who I am. Then, having known Me in truth, he enters into Me immediately after that. |18.55|

।18.56।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌॥ ५६ ॥

शब्दार्थ
सर्वकर्माण्यपि - सब कर्म भी
सदा - सदा
कुर्वाणो - करता हुआ
मद्व्यपाश्रयः - मेरा आश्रय लेनेवाला
मत्प्रसादादवाप्नोति - मेरी कृपा से प्राप्त हो जाता है
शाश्वतं - शाश्वत
पदमव्ययम्‌ - अविनाशी पद को

भावार्थ/Translation
   मेरा आश्रय लेने वाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है |18.56|

   ਮੇਰਾ ਸਹਾਰਾ ਲੈਣ ਵਾਲਾ ਭਗਤ ਹਮੇਸ਼ਾ ਸਭ ਕਰਮ ਕਰਦਾ ਹੋਇਆ ਵੀ ਮੇਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਾਲ ਸਦਾ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਪਦ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ |18.56|

   Though engaged in all kinds of activities, My pure devotee, taking refuge in me, reaches the eternal and imperishable abode by My grace.|18.56|

।18.57।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥ ५७ ॥

शब्दार्थ
चेतसा - चित्त से
सर्वकर्माणि - सम्पूर्ण कर्म
मयि - मुझ में
सन्न्यस्य - अर्पण करके
मत्परः - मेरे परायण होकर
बुद्धियोगमुपाश्रित्य - बुद्धि योग का आश्रय लेकर
मच्चित्तः - मुझ में चित्त वाला
सततं - निरन्तर
भव - हो जा

भावार्थ/Translation
   चित्त से सम्पूर्ण कर्म मुझ में अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरन्तर मुझ में चित्त वाला हो जा |18.57|

   ਚਿੱਤ ਨਾਲ ਸੰਪੂਰਣ ਕਰਮ ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਅਰਪਣ ਕਰਕੇ , ਮੇਰੇ ਪਰਾਇਣ ਹੋ ਕੇ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਯੋਗ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਲੈ ਕੇ ਨਿਰੰਤਰ ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਚਿੱਤ ਵਾਲਾ ਹੋ ਜਾ |18.57|

   Mentally surrendering all actions to Me and accepting Me as the supreme, have your mind ever fixed on Me, concentrate your intellect on Me. |18.57|

।18.58।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ ५८ ॥

शब्दार्थ
मच्चित्तः - मेरे में चित्त लगाकर
सर्वदुर्गाणि - सम्पूर्ण विघ्नों को
मत्प्रसादात्तरिष्यसि - मेरी कृपा से तर जायगा
अथ - और यदि
चेत्वमहाङ्‍कारान्न - तू अहंकारके कारण
श्रोष्यसि - सुनेगा
विनङ्क्ष्यसि - पतन हो जायगा

भावार्थ/Translation
   मेरे में चित्त लगा कर तू मेरी कृपा से सम्पूर्ण विघ्नों को तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा |18.58|

   ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਚਿੱਤ ਲਗਾ ਕੇ ਤੂੰ ਮੇਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਾਲ ਸੰਪੂਰਣ ਵਿਘਨਾਂ ਨੂੰ ਤਰ ਜਾਏਗਾ ਅਤੇ ਜੇਕਰ ਤੂੰ ਅਹੰਕਾਰ ਦੇ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਸੁਣੇਗਾ ਤਾਂ ਤੇਰਾ ਪਤਨ ਹੋ ਜਾਏਗਾ |18.58|

   Having your mind fixed on Me, you will cross over all difficulties through My grace. If you do not listen due to our ego, you will perish. |18.58|

।18.59।
यदहङ्‍कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥

शब्दार्थ
यदहङ्‍कारमाश्रित्य - और अहंकारवश
न योत्स्य - युद्ध नहीं करूंगा
इति - ऐसा
मन्यसे - मान रहा है
मिथ्यैष - मिथ्या है
व्यवसायस्ते - निश्चय
प्रकृतिस्त्वां - प्रकृति ही तुम्हें
नियोक्ष्यति - प्रवृत्त करेगी

भावार्थ/Translation
   और अहंकारवश तु ऐसा मान रहा है , युद्ध नहीं करूंगा, यह तुम्हारा निश्चय मिथ्या है, क्योंकि प्रकृति ही तुम्हें प्रवृत्त करेगी |18.59|

   ਅਤੇ ਅਹੰਕਾਰਵਸ਼ ਤੁ ਅਜਿਹਾ ਮੰਨ ਰਿਹਾ ਹੈ , ਲੜਾਈ ਨਹੀਂ ਕਰਾਂਗਾ , ਇਹ ਤੇਰਾ ਨਿਸ਼ਚਾ ਝੂੱਠ ਹੈ , ਕਿਉਂਕਿ ਤੇਰੀ ਕੁਦਰਤ ਹੀ ਤੈਨੂੰ ਮਜਬੂਰ ਕਰੇਗੀ |18.59|

   If due to your ego, you think that you will not fight, then your resolve is useless because the nature will compel you to fight. |18.59|

।18.60।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌ ॥ ६० ॥

शब्दार्थ
स्वभावजेन - स्वाभाविक
कौन्तेय - हे अर्जुन
निबद्धः - बंधे हो
स्वेन - अपने
कर्मणा - कर्मों से
कर्तुं नेच्छसि - करना नहीं चाहते हो
यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि - मोह के कारण जिस को , वही तुम विवश होकर करोगे
तत्‌ - वही

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, तुम अपने स्वाभाविक कर्मों से बंधे हो, मोह के कारण जिस को करना नहीं चाहते हो, वही तुम विवश होकर करोगे |18.60|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ , ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਸਵੈਭਾਵਕ ਕਰਮਾਂ ਨਾਲ ਬੱਝਿਆਂ ਹੈਂ , ਮੋਹ ਦੇ ਕਾਰਨ ਤੂੰ ਜਿਸ ਨੂੰ ਕਰਣਾ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦਾ , ਉਹੀ ਤੂੰ ਮਜ਼ਬੂਰ ਹੋ ਕੇ ਕਰੇਂਗਾ |18.60|

   O Arjuna, You are bound by your nature and duty. Even if you don't want to do some work due to delusion, you will be compelled to do the same. |18.60|

।18.61।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥ ६१ ॥

शब्दार्थ
ईश्वरः - ईश्वर
सर्वभूतानां - हृदय में
हृद्देशेऽजुर्न - हे अर्जुन, हृदय में
तिष्ठति - रहता है
भ्रामयन्सर्वभूतानि - भ्रमण कराता है, सम्पूर्ण प्राणियोंको
यन्त्रारुढानि - यन्त्र पर आरूढ़ हुए
मायया - माया से

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में रहता है और अपनी माया से (शरीर रूपी) यन्त्र पर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को भ्रमण कराता है |18.61|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ , ਰੱਬ ਸੰਪੂਰਣ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਆਪਣੀ ਮਾਇਆ ਨਾਲ ( ਸਰੀਰ ਰੂਪੀ ) ਯੰਤਰ ਉੱਤੇ ਸਵਾਰ ਦੀ ਤਰਾਂ ਬੈਠੇ ਹੋਏ ਸੰਪੂਰਣ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਨੂੰ ਘੁੰਮਾਉਂਦਾ ਹੈ |18.61|

   The Supreme Lord is situated in everyone’s heart, O Arjuna, and is directing the wanderings of all living entities, as seated on a machine, by his mystic illusive power. |18.61|

।18.62।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥ ६२ ॥

शब्दार्थ
तमेव - तुम
शरणं - शरण में
गच्छ - जाओ
सर्वभावेन - सम्पूर्ण भाव से
भारत - हे अर्जुन
तत्प्रसादात्परां - उसके प्रसाद से तुम परम
शान्तिं - शान्ति
स्थानं - स्थान को
प्राप्स्यसि - प्राप्त करोगे
शाश्वतम्‌ - और शाश्वत

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, तुम सम्पूर्ण भाव से ईश्वर की शरण में जाओ। उसके प्रसाद से तुम परम शान्ति और शाश्वत स्थान को प्राप्त करोगे |18.62|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ , ਤੂੰ ਸੰਪੂਰਣ ਭਾਵ ਨਾਲ ਰੱਬ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਵਿੱਚ ਜਾ । ਉਸਦੇ ਪ੍ਰਸਾਦ ਨਾਲ ਤੂੰ ਪਰਮ ਸ਼ਾਂਤੀ ਅਤੇ ਪਰਮ ਸਥਾਨ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰੇਂਗਾ |18.62|

   O Arjuna, surrender unto Him utterly. By His grace you will attain transcendental peace and the supreme and eternal abode. |18.62|

।18.63।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥

शब्दार्थ
इति ते - इस प्रकार
ज्ञानमाख्यातं - ज्ञान मैंने तुमसे कहा
गुह्याद्‍गुह्यतरं - गोपनीयों से अधिक गोपनीय
मया - मैंने
विमृश्यैतदशेषेण - पूर्ण विचार करके
यथेच्छसि - जैसी इच्छा हो
तथा - वैसा
कुरु - तुम करो

भावार्थ/Translation
   इस प्रकार समस्त गोपनीयों से अधिक गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कहा इस पर पूर्ण विचार करके जैसी इच्छा हो, वैसा तुम करो |18.63|

   ਇਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਸਾਰੇ ਗੁਪਤ ਗਿਆਂਨਾ ਤੋਂ ਜਿਆਦਾ ਗੁਪਤ ਗਿਆਨ ਮੈਂ ਤੈਂਨੂੰ ਕਿਹਾ, ਇਸ ਤੇ ਸਾਰਾ ਵਿਚਾਰ ਕਰਕੇ ਜੈਸੀ ਇੱਛਾ ਹੋਵੇ , ਉਹੋ ਜਿਹਾ ਤੂੰ ਕਰ |18.63|

   Thus I have explained to you knowledge which is even more confidential. Deliberate on this fully, and then do what you wish to do. |18.63|

।18.64।
सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्‌ ॥ ६४ ॥

शब्दार्थ
सर्वगुह्यतमं - सबसे अत्यन्त गोपनीय
भूय: - फिर
श्रृणु मे - मेरे से सुन
परमं - परम
वचः - वचन
इष्टोऽसि मे - तू मेरा प्रिय है
दृढमिति - अत्यन्त
ततो - इसलिये
वक्ष्यामि - कहूँगा
ते हितम्‌ - तेरे हित की

भावार्थ/Translation
   सबसे अत्यन्त गोपनीय परम वचन तू फिर मेरे से सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हित की बात कहूँगा |18.64|

   ਸਭ ਤੋਂ ਅਤਿਅੰਤ ਗੁਪਤ ਪਰਮ ਵਚਨ ਤੂੰ ਫਿਰ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਸੁਣ, ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਅਤਿਅੰਤ ਪਿਆਰਾ ਹੈ , ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਤੇਰੇ ਹਿੱਤ ਦੀ ਗੱਲ ਕਹਾਂਗਾ |18.64|

   Because you are My very dear friend, I am speaking to you My supreme instruction, the most confidential knowledge of all. Hear this from Me, for it is for your benefit. |18.64|

।18.65।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥

शब्दार्थ
मन्मना - मेरे में मनवाला
भव -हो
मद्भक्तो - मेरा भक्त
मद्याजी - मेरा पूजन करने वाला
मां नमस्कुरु - मेरे को नमस्कार कर
मामेवैष्यसि - मेरे को ही प्राप्त हो जायगा
सत्यं ते - यह सत्य
प्रतिजाने - प्रतिज्ञा करता हूँ
प्रियोऽसि मे - मेरा अत्यन्त प्रिय है

भावार्थ/Translation
   मेरे में मनवाला हो, मेरा भक्त हो, मेरा पूजन करने वाला हो और मेरे को नमस्कार कर, ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त हो जायगा - मैं यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है |18.65|

   ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਮਨ ਵਾਲਾ ਹੋ , ਮੇਰਾ ਭਗਤ ਹੋ , ਮੇਰਾ ਪੂਜਨ ਕਰਣ ਵਾਲਾ ਹੋ ਅਤੇ ਮੇਨੂੰ ਨਮਸਕਾਰ ਕਰ , ਅਜਿਹਾ ਕਰਣ ਨਾਲ ਤੂੰ ਮੇਨੂੰ ਹੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਏਗਾ - ਮੈਂ ਇਹ ਸੱਚ ਦਾਅਵਾ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਕਿਉਂਕਿ ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਅਤਿਅੰਤ ਪਿਆਰਾ ਹੈਂ |18.65|

   Always think of Me, become My devotee, worship Me and offer your homage unto Me. Thus you will come to Me without fail. I promise you this because you are My very dear friend. |18.65|

।18.66।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥

शब्दार्थ
सर्वधर्मान्परित्यज्य - सब धर्मों का परित्याग करके
मामेकं - केवल मेरी
शरणं - शरण में
व्रज - आ जा
अहं - मैं
त्वा - तुझे
सर्वपापेभ्यो - सम्पूर्ण पापों से
मोक्षयिष्यामि - मुक्त कर दूँगा
मा शुचः - चिन्ता मत कर

भावार्थ/Translation
   सब धर्मों का परित्याग करके तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर |18.66|

   ਸਭ ਧਰਮਾਂ ਦਾ ਤਿਯਾਗ ਕਰਕੇ ਤੂੰ ਕੇਵਲ ਮੇਰੀ ਸ਼ਰਨ ਵਿੱਚ ਆ ਜਾ । ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਸੰਪੂਰਣ ਪਾਪਾਂ ਤੋਂ ਅਜ਼ਾਦ ਕਰ ਦੇਵਾਂਗਾ , ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਕਰ |18.66|

   Abandon all varieties of religion and just surrender unto Me. I shall deliver you from all sinful reactions, grieve not. |18.66|

।18.67।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥

शब्दार्थ
इदं ते - यह ज्ञान
नातपस्काय - जो तपरहित है
नाभक्ताय - जो अभक्त है
कदाचन - नहीं
न चाशुश्रूषवे - जो सेवा में तत्पर नहीं है
वाच्यं - कहना चाहिए
न च मां - मुझ में
योऽभ्यसूयति - और न ही उससे जो दोष देखता है

भावार्थ/Translation
   यह ज्ञान ऐसे पुरुष से नहीं कहना चाहिए, जो तप रहित है, जो अभक्त है, जो सेवा में तत्पर नहीं है और न ही उससे जो मुझ में दोष देखता है |18.67|

   ਇਹ ਗਿਆਨ ਅਜਿਹੇ ਪੁਰਖ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ, ਜੋ ਤਪ ਰਹਿਤ ਹੈ , ਜੋ ਭਗਤ ਨਹੀਂ ਹੈ , ਜੋ ਸੇਵਾ ਵਿੱਚ ਤਤਪਰ ਨਹੀਂ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਮੇਰੇ ਵਿੱਚ ਦੋਸ਼ ਵੇਖਦਾ ਹੈ |18.67|

   This is never to be spoken by you to one who is devoid of austerities or devotion, nor to one who does not render service and nor to one who sees fault in Me. |18.67|

।18.68।
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥

शब्दार्थ
य इमं - इस का
परमं गुह्यं - परम गोपनीय
मद्भक्तेष्वभिधास्यति - मेरे भक्तों को देता है
भक्तिं - भक्ति
मयि - मुझसे
परां - परा
कृत्वा - करके
मामेवैष्यत्यसंशयः - वह निसन्देह मुझे ही प्राप्त होता है

भावार्थ/Translation
   जो मुझसे परा भक्ति करके यह परम गोपनीय उपदेश मेरे भक्तों को देता है, वह निसन्देह मुझे ही प्राप्त होता है |18.68|

   ਜੋ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਪਰਾ ਭਗਤੀ ਕਰਕੇ ਇਹ ਪਰਮ ਗੁਪਤ ਉਪਦੇਸ਼ ਮੇਰੇ ਭਗਤਾਂ ਨੂੰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ , ਉਹ ਬਿਨਾਂ ਸ਼ੱਕ ਮੈਨੂੰ ਹੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ |18.68|

   He who, entertaining supreme devotion to Me, will speak of this highest secret, to My devotees will without doubt reach Me alone. |18.68|

।18.69।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥

शब्दार्थ
न च - भी नहीं
तस्मान्मनुष्येषु - उसके समान मनुष्यों में
कश्चिन्मे - कोई भी मेरा नहीं है
प्रियकृत्तमः - प्रिय कार्य करने वाला
भविता - होगा
न च मे - मेरा
तस्मादन्यः - दूसरा कोई
प्रियतरो - उससे बढ़कर प्रिय
भुवि - भूमण्डल पर

भावार्थ/Translation
   उसके समान मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है और इस भूमण्डल पर दूसरा कोई उससे बढ़कर प्रिय होगा भी नहीं |18.69|

   ਉਸਦੇ ਸਮਾਨ ਮੇਰਾ ਪਿਆਰਾ ਕਾਰਜ ਕਰਣ ਵਾਲਾ ਮਨੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਭੂਮੰਡਲ ਉੱਤੇ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਉਸਤੋਂ ਵਧ ਕੇ ਪਿਆਰਾ ਹੋਵੇਗਾ ਵੀ ਨਹੀਂ |18.69|

   There is no one in this world more dear to Me than he, nor will there ever be one more dear on this planet. |18.69|

।18.70।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥

शब्दार्थ
अध्येष्यते - अध्ययन करेगा
च य - जो
इमं - इस
धर्म्यं - धर्ममय
संवादमावयोः - हम दोनों के संवाद का
ज्ञानयज्ञेन - ज्ञान यज्ञ से
तेनाहमिष्टः - उसके द्वारा पूजित
स्यामिति - होऊँगा, ऐसा
मे मतिः - मेरा मत है

भावार्थ/Translation
   जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा ऐसा मेरा मत है |18.70|

   ਜੋ ਸਾਡੇ ਦੋਨਾਂ ਦੇ ਇਸ ਧਰਮਮੀ ਸੰਵਾਦ ਦਾ ਪਾਠ ਕਰੇਗਾ , ਉਸਦੇ ਦੁਆਰਾ ਮੈਂ ਗਿਆਨ ਯੱਗ ਨਾਲ ਪੂਜਿਆ ਸਮਝਿਆ ਜਾਵਾਂਗਾ ਅਜਿਹਾ ਮੇਰਾ ਮਤ ਹੈ |18.70|

   And I declare that he who studies this sacred conversation of ours worships Me by his intelligence at the altar of wisdom. |18.70|

।18.71।
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌ ॥ ७१ ॥

शब्दार्थ
श्रद्धावाननसूयश्च - श्रद्धावान् और दोष दृष्टि से रहित
श्रृणुयादपि - सुन भी लेगा
यो नरः - जो मनुष्य
सोऽपि - वह भी
मुक्तः - मुक्त होकर
शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌ - पुण्यकर्मियों के शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा

भावार्थ/Translation
   श्रद्धावान् और दोष दृष्टि से रहित जो मनुष्य इस को सुन भी लेगा, वह भी मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा |18.71|

   ਸ਼ਰਧਾਵਾਨ ਅਤੇ ਦੋਸ਼ ਨਜ਼ਰ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਇਸ ਨੂੰ ਸੁਣ ਵੀ ਲਵੇਗਾ , ਉਹ ਵੀ ਮੁਕਤ ਹੋ ਕੇ ਪੁੰਣਕਰਮੀਆਂ ਦੇ ਸ਼ੁਭ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਏਗਾ |18.71|

   Also the man who hears this, full of faith and free from malice, will be liberated, and shall attain to the pious worlds of those of righteous deeds. |18.71|

।18.72।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥

शब्दार्थ
कच्चिदेतच्छ्रुतं - क्या इसको सुना
पार्थ - हे अर्जुन
त्वयैकाग्रेण - तुमने एकाग्र
चेतसा - चित्त से
कच्चिदज्ञानसम्मोहः - अज्ञान से उत्पन्न मोह
प्रनष्टस्ते - नष्ट हुआ
धनञ्जय - हे अर्जुन

भावार्थ/Translation
   हे अर्जुन, क्या तुमने एकाग्रचित्त से इसको सुना और हे अर्जुन, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ |18.72|

   ਹੇ ਅਰਜੁਨ , ਕੀ ਤੂੰ ਸਥਿਰ-ਚਿੱਤ ਨਾਲ ਇਸਨ੍ਹੂੰ ਸੁਣਿਆ ਅਤੇ ਹੇ ਅਰਜੁਨ , ਕੀ ਤੇਰਾ ਅਗਿਆਨ ਨਾਲ ਪੈਦਾ ਮੋਹ ਨਸ਼ਟ ਹੋ ਗਿਆ |18.72|

   O Arjuna, has this been listened to by you with a one-pointed mind, O Arjuna, has your delusion caused by ignorance been destroyed. |18.72|

।18.73।
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥

शब्दार्थ
अर्जुन उवाच - अर्जुन ने कहा
नष्टो - नष्ट हो गया
मोहः - मोह
स्मृतिर्लब्धा - ज्ञान प्राप्त हो गया
त्वप्रसादान्मयाच्युत - हे अच्युत, आपकी कृपा से
स्थितोऽस्मि - मैं स्थित हूँ
गतसंदेहः सन्देहरहित होकर
करिष्ये - पालन करूँगा
वचनं - वचन
तव - आपके

भावार्थ/Translation
   अर्जुन ने कहा - हे अच्युत आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया अब मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ और मैं आपके वचन का पालन करूँगा |18.73|

   ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਕਿਹਾ - ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣ, ਤੁਹਾਡੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਾਲ ਮੇਰਾ ਮੋਹ ਨਸ਼ਟ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਮੈਨੂੰ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਗਿਆ, ਹੁਣ ਮੈਂ ਸੰਦੇਹ ਰਹਿਤ ਹੋ ਕੇ ਸਥਿਤ ਹਾਂ ਅਤੇ ਮੈਂ ਤੁਹਾਡੇ ਵਚਨ ਦਾ ਪਾਲਣ ਕਰਾਂਗਾ |18.73|

   Arjuna said O Achyuta, my delusion has been destroyed and truth has been regained by me through Your grace. I stand with my doubt removed; I shall follow Your instruction. |18.73|

।18.74।
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्‌ ॥ ७४ ॥

शब्दार्थ
संजय उवाच - संजय ने कहा
इत्यहं - इस प्रकार
वासुदेवस्य - वासुदेव
पार्थस्य - अर्जुन के
च महात्मनः - और महात्मा
संवादमिममश्रौषमद्भुतं - इस अद्भुत संवाद सुना
रोमहर्षणम्‌ - रोमान्चक

भावार्थ/Translation
   संजय ने कहा, इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमान्चक संवाद सुना |18.74|

   ਸੰਜੈ ਨੇ ਕਿਹਾ , ਇਸ ਤਰਾੰ ਮੈਂਨੇ ਵਾਸੁਦੇਵ ਅਤੇ ਮਹਾਤਮਾ ਅਰਜੁਨ ਦੇ ਇਸ ਅਨੌਖੇ ਅਤੇ ਰੋਮਾਂਚਕ ਸੰਵਾਦ ਨੂੰ ਸੁਣਿਆ |18.74|

   Sanjaya said: Thus I have heard this wonderful and thrilling dailogue of Vasudeva and the great Arjuna. |18.74|

।18.75।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं परम्‌ ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌॥ ७५ ॥

शब्दार्थ
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं - व्यासजी की कृपा से मैंने सुना है, इस गोपनीय
परम्‌ - परम
योगं - योग
योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः - कहते हुए साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से
स्वयम्‌ - स्वयं

भावार्थ/Translation
   व्यास जी की कृपा से मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुना है |18.75|

   ਵਿਆਸ ਜੀ ਦੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਾਲ ਮੈਂਨੇ ਆਪ ਇਸ ਪਰਮ ਗੁਪਤ ਯੋਗ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਹੋਏ ਸਾਕਸ਼ਾਤ ਯੋਗੇਸ਼ਵਰ ਸ਼੍ਰੀ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣ ਤੋਂ ਸੁਣਿਆ ਹੈ |18.75|

   Through the grace of Vyasa I have heard this supreme and secret Yoga direct from Krishna, the Lord of Yoga, Himself declaring it. |18.75|

।18.76।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्‌ ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥

शब्दार्थ
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य - हे राजन्, याद कर कर के
संवादमिममद्भुतम्‌ - अद्भुत संवाद को
केशवार्जुनयोः - श्री कृष्ण और अर्जुन के
पुण्यं - पवित्र
हृष्यामि - हर्षित हो रहा हूँ
च मुहुर्मुहुः - बार बार

भावार्थ/Translation
   हे राजन्, भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को याद कर कर के मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ |18.76|

   ਹੇ ਰਾਜਨ , ਭਗਵਾਂਨ ਸ਼੍ਰੀ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣ ਅਤੇ ਅਰਜੁਨ ਦੇ ਇਸ ਪਵਿਤਰ ਅਤੇ ਅਨੌਖੇ ਸੰਵਾਦ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰ ਕਰਕੇ ਮੈਂ ਬਾਰਬਾਰ ਗਦ ਗਦ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹਾਂ |18.76|

   O King, as I repeatedly recall this wondrous and holy dialogue between Krishna and Arjuna, I take pleasure, being thrilled again and again. |18.76|

।18.77।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्‌ राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥

शब्दार्थ
तच्च - उस
संस्मृत्य संस्मृत्य - पुन पुन स्मरण
रूपमत्यद्भुतं हरेः - श्री हरि के अति अद्भुत रूप को
विस्मयो - विस्मय होता है
मे महान्‌ - मुझे महान्
राजन्हृष्यामि - हे राजन, हर्षित हो रहा हूँ
च पुनः पुनः - और बारम्बार

भावार्थ/Translation
   हे राजन, श्री हरि के उस अति अद्भुत रूप को भी पुन पुन स्मरण करके मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ |18.77|

   ਹੇ ਰਾਜਨ , ਸ਼੍ਰੀ ਹਰਿ ਦੇ ਉਸ ਅਤਿ ਅਨੌਖੇ ਰੂਪ ਨੂੰ ਵੀ ਬਾਰਬਾਰ ਸਿਮਰਨ ਕਰਕੇ ਮੈਨੂੰ ਮਹਾਨ ਅਚਰਜ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਮੈਂ ਬਾਰਬਾਰ ਗਦ ਗਦ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹਾਂ |18.77|

   O King, as I remember the wonderful form of Lord Krishna, I am struck with wonder more and more, and I rejoice again and again. |18.77|

।18.78।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥

शब्दार्थ
यत्र - जहाँ
योगेश्वरः - योगेश्वर
कृष्णो - श्री कृष्ण हैं
यत्र - जहाँ
पार्थो - अर्जुन हैं
धनुर्धरः - धनुषधारी
तत्र - हाँ
श्रीर्विजयो - श्री, विजय
भूतिर्ध्रुवा - ऐश्वर्य, स्थिर
नीतिर्मतिर्मम - नीति है, ऐसा मेरा मत है

भावार्थ/Translation
   जहाँ योगेश्वर श्री कृष्ण हैं और जहाँ धनुष धारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, ऐश्वर्य और स्थिर नीति है, ऐसा मेरा मत है |18.78|

   ਜਿੱਥੇ ਯੋਗੇਸ਼ਵਰ ਸ਼੍ਰੀ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣ ਹਨ ਅਤੇ ਜਿੱਥੇ ਧਨੁਸ਼ ਧਾਰੀ ਅਰਜੁਨ ਹਨ , ਉੱਥੇ ਹੀ ਸ਼੍ਰੀ , ਫਤਹਿ , ਐਸ਼ਵਰਿਐ ਅਤੇ ਸਥਿਰ ਨੀਤੀ ਹੈ , ਅਜਿਹਾ ਮੇਰਾ ਮਤ ਹੈ |18.78|

   Wherever there is Krishna, the master of Yoga, and wherever there is Arjuna, the supreme archer, there will also certainly be opulence, victory, fortune, and firm policy. That is my opinion.|18.78|


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः॥18.1-18.78॥

To be Completed by 25th August, 2016 (78 days)

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